हरिहर नाथ मंदिर, सोनपुर
Hariharnath Temple :- बिहार के सारण जिले में स्थित सोनपुर में हरिहरनाथ का अति प्राचीन मंदिर है. जो भारतीय राज्य बिहार के उत्तरी भाग में स्थित है। हम आपको बता दें कि सोनपुर हाजीपुर से लगभग 3 किलोमीटर कि दूरी पर स्थित हैं जबकि बिहार कि राजधानी पटना से 25 किलोमीटर कि दूरी पर हैं। यहां हरि श्रीविष्णु और हर यानी कि महादेव की प्रतिमा एक साथ स्थापित की गई है.

हरिहर नाथ मंदिर का इतिहास
हरिहर नाथ मंदिर दुनिया के सबसे अनोखे मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मूर्ति आधी शिव और आधी विष्णु की है। शिव को हर और विष्णु को हरि के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि इस मंदिर को हरिहर नाथ मंदिर कहा जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा दो संप्रदायों – शैव और वैष्णव – को एक साथ लाने के लिए किया गया था। यह लोकप्रिय मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने इस मंदिर में मूर्ति की स्थापना की थी। कुछ लोगों के अनुसार, भगवान राम जनकपुर जाते समय ऋषि विश्वामित्र के साथ कुछ समय के लिए यहां रुके थे।
सोनपुर, जहां यह मंदिर स्थित है, अपने पशु मेले के लिए भी प्रसिद्ध है। हिंदू पौराणिक कथाओं में हाथी और मगरमच्छ की कहानी भी एक प्रसिद्ध किंवदंती है जो इस मंदिर से जुड़ी हुई है। एक दिन एक मगरमच्छ ने एक हाथी को पकड़ लिया जो तालाब से पानी पी रहा था। दोनों के बीच झगड़ा हो गया. जब हाथी कमजोर होने लगा तो भगवान विष्णु ने उन दोनों के बीच अपना सुदर्शन चक्र फेंक दिया। तभी से यहां पशु मेला लोकप्रिय है। कार्तिक पूर्णिमा, जिस दिन युद्ध समाप्त हुआ था, एक बहुत ही उत्सवपूर्ण धार्मिक आयोजन माना जाता है।

हरिहरनाथ मंदिर के दर्शन करने जाने का सबसे अच्छा समय
हरिहरनाथ मंदिर जाने के लिए सबसे अच्छा समय कार्तिक पूर्णिमा का माना जाता हैं। क्योंकि इसी दिन से सोनपुर पशु मेला की शुरुआत होती हैं और इस दिन गंडक और गंगा नदी के संगम स्थल पर स्नान करना पवित्र माना जाता हैं। हलाकि आप हरिहरनाथ मंदिर में भगवान के दर्शन करने के लिए साल में किसी भी समय जा सकते हैं।
हरिहरनाथ मंदिर का आकर्षण सोनपुर मेला
सोनपुर मेला बिहार के लोकप्रिय मेलों में से एक है। हिंदू कैलेंडर माह के अनुसार, यह हर साल सरकार द्वारा कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) महीने में आयोजित किया जाता है। इस मेले का आयोजन प्राचीनकाल से हो रहा है। इस मेले में लगभग 2500 वर्ष पहले से लोग पशुओं की खरीद-बिक्री करने और अदला-बदली करने के लिए आते थे। वे अपनी जरूरत के मुताबिक पशुओं को लेकर यहाँ से जाते थे। आदिकाल में महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य इस मेले से हाथी और घोड़े खरीद कर ले जाया करते थे। युद्ध में लड़ने वाले ये सभी बेहद दमदार हाथी और घोड़े हुआ करते थे, जिन्होने इतिहास में पहली बार मौर्य सम्राट को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी विजय पताका लहराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

5-6 किलोमीटर के वृहद क्षेत्रफल में फैला यह मेला हरिहरक्षेत्र मेला और छत्तर मेला मेला के नाम से भी जाना जाता है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा के स्नान के साथ यह मेला शुरू हो जाता है और एक महीने तक चलता है। यहां मेले से जुड़े तमाम आयोजन होते हैं। इसे महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष रूप से मनाया जाता है। मेले में लाखों श्रद्धालु भक्त इस मंदिर के दर्शन करने आते हैं। मेले के दौरान विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम, पूजा-अर्चना और भजन-कीर्तन की गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा मेले में विभिन्न प्रकार की वस्त्री, आहार और वस्त्र विक्रेताओं की गलियारें सजी होती हैं। यह मेला एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में लोगों को एकजुट करता है और इसे उन्नति, समृद्धि और सुख का प्रतीक माना जाता है।
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यहां पर लोगों को शांति, मनोरंजन और आध्यात्मिकता का अनुभव करने का अवसर मिलता है। मेले का आयोजन धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन के लिए बिहार के तौरिस्ट स्थलों में एक महत्वपूर्ण प्रमुखता रखता है।
हरिहर नाथ मंदिर, सोनपुर बिहार की गर्मी में शीतल स्थल के रूप में लोगों के द्वारा पूज्य और प्रसन्नित किया जाता है। इसकी महत्ता और सुंदरता इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता प्राप्त कराती है। इसके आसपास के क्षेत्र में बहुत सारे होटल, आश्रम और आवासीय सुविधाएं हैं जो श्रद्धालुओं को ठहरने के लिए उपलब्ध हैं।
यहां पर गर्मियों में भी मंदिर के प्रवेशद्वार पर उन्नत वातानुकूलन प्रणाली होती है जो श्रद्धालुओं को आरामदायक और शीतल माहौल प्रदान करती है। मंदिर की स्थानीय आदत और प्रथाओं का पालन करते हुए, इसे धार्मिक एवं पर्यटन संबंधित योजनाओं के लिए भी प्रसिद्धता मिली है।
हरिहरनाथ मंदिर में सावन मास में कांवरियों भीड़ और मेला
सावन में पूरे बिहार से शिवालयों में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी. शिवभक्त गंडक नदी में स्नान कर वे पैदल यात्रा करते हैं, अपने श्रद्धालु गानों और भजनों के साथ भोलेनाथ की महिमा गाते हुए पूजा करते हैं। शिवालयों में पहुंचे और भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया. साथ ही श्रद्धालुओं ने धतूरा, भांग, चंदन आदि चढ़ाकर मत्था टेका। बोलबम और हर-हर महादेव के जयकारे से पूरा इलाका गुंजायमान रहा। मेले के दौरान मंदिर के आसपास कैंप लगाए जाते हैं जहां कांवरियों को आराम की व्यवस्था की जाती है और उन्हें भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
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