कुतुब मीनार
भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास उसकी समृद्धि और विविधता से भरपूर है। इसका परिणाम है कि यहाँ पर अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल हैं, जो हमें विभिन्न कालों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। इनमें से एक है “कुतुब मीनार”, जो दिल्ली के एक प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है और दुनिया भर में अपनी महत्वपूर्णता के लिए प्रसिद्ध है।
कुतुब मीनार, जिसे आमतौर पर ‘कुतुब टॉवर’ भी कहा जाता है, भारतीय स्तंभ कला के एक अद्वितीय उदाहरण के रूप में ख्यातिप्राप्त है। यह दिल्ली के सत्रहवीं शताब्दी में तुरुष्को शासक कुतुब-उद-दीन-ऐबक द्वारा बनवाया गया था। इसका निर्माण कार्य वर्ष 1192 ईसा पूर्व में आरंभ हुआ था और उसकी पूर्णाहुति 1386 ईसा पूर्व में हुई थी।

यह स्तूपकार विनाम्रता के साथ आकर्षित होने वाली विशेषता का प्रतीक है। इसकी ऊँचाई 73 मीटर है और यह भारत में सबसे ऊँची अंगविन्यासी स्तंभ है। यह लाल पत्थर से बना है और उसकी शिखर में जालीदार डिजाइन दिलचस्पी से बुनी गई है।
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कुतुब मीनार का नाम उस मुस्लिम शासक कुतुब-उद-दीन-ऐबक के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इसका निर्माण करवाया था। यह मीनार मुख्य रूप से एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक उत्तराधिकारी शासक के शक्ति प्रदर्शन के रूप में बनवाया गया था। इसके निर्माण ने उस समय के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण मूल्यांकन की दिशा में परिणाम दिया।
कुतुब मीनार की वास्तुकला बेहद रोचक है। इसमें भारतीय और तुर्की वास्तुकला के विभिन्न घटकों का मिश्रण है, जो इसकी अद्वितीयता को और भी बढ़ाता है। इसमें लाल पत्थर, सफेद मार्बल और सब्जी पत्थर का प्रयोग किया गया है, जिससे उसकी शृंगारशीलता और रमणीयता में वृद्धि होती है।

कुतुब मीनार के चारों ओर एक प्रांगण है, जिसमें कई महत्वपूर्ण स्मारक स्थित हैं, जैसे कि कुतुब-उद-दीन-ऐबक की कब्र, इल्तुतमिश की जामा मस्जिद, अलाई दरवाजा और कई अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएँ।
कुल मिलाकर, कुतुब मीनार भारतीय विरासत की एक महत्वपूर्ण धारोहर है, जो उस समय की सांस्कृतिक और वास्तुकला की झलक प्रस्तुत करता है, जब भारत एक समृद्धि और सांस्कृतिक विविधता की अद्वितीय धरोहर था। इसकी अद्वितीयता, ऊँचाई और वास्तुकला की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण, यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के रूप में दुनिया भर में मशहूर है।
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कुतुब मीनार: दिल्ली का गर्व और ऐतिहासिक महत्व:
हालांकि आमतौर पर इसे ‘कुतुब मीनार’ के रूप में जाना जाता है, लेकिन कई स्थानों पर इसे ‘भुतहा मीनार’ भी कहा जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं, जो इस ऐतिहासिक स्मारक को भारतीय ऐतिहासिक विवाद का हिस्सा बना देते हैं।
भुतहा का इतिहास:
भुतहा, जिसे कुछ लोग कुतुबपुर नाम से भी जानते हैं, एक प्राचीन गांव था जो कुतुब मीनार के पास स्थित है। इसे ‘भुतहा’ कहने का कारण यहां पर भूतों के प्रतीकों की मूर्तियां पाई गई थीं, जिन्हें स्थानीय लोग भुत या प्रेत की मूर्तियों का रूप देने लगे थे।

वास्तुकला की अद्वितीयता:
इसकी वास्तुकला में इस्लामी और हिन्दू शैली का मिश्रण देखने को मिलता है, जो इसे अद्वितीय बनाता है। मीनार के ऊपर की ओर बढ़ते समय, उसकी दीवारों पर अलंकरण में काटन और गीतों की कहानियां उकेरी गई हैं, जो इसकी खासियत को और भी बढ़ा देती हैं।
ऐतिहासिक महत्व:
कुतुब मीनार का इतिहासिक महत्व भारतीय इतिहास में अत्यधिक है। यह दिल्ली सल्तनत के समय की यादगार है और इसके आस-पास कई महत्वपूर्ण स्थल हैं जैसे कि कुतुब का महल, इब्राहीम लोदी की मकबरा, अलाई दरवाजा आदि।

विवादों का केंद्र:
कुतुब मीनार को “कुतुब” नामक गांव के पास स्थित होने के कारण इसका यह नाम दिया गया है। हालांकि, विवादों का कारण यह है कि कुतुबपुर नामक एक और गांव भी है जो कुतुब मीनार के बहुत करीब स्थित है। इसके कारण, कुतुब मीनार के सटीक स्थान को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है कि कौनसे गांव के पास यह मीनार स्थित है।
कुतुबपुर के नाम से विवाद का मुख्य कारण यह है कि कुतुबपुर गांव के निवासियों के अनुसार, मीनार कुतुबपुर के बगीचे में स्थित होने के कारण उनके गांव का नाम उसके आधार पर रखा गया है। वहीं, कुतुब मीनार के स्थान के पास के गांव के निवासियों के अनुसार, मीनार कुतुब मीनार के नामक गांव के पास स्थित होने के कारण उसका नाम दिया गया है। इसकी ऊँचाई को देखकर लोगों को ऐसा लगता है कि यह स्थान भूतों का आवास हो सकता है, जिससे उन्हें डर और आकर्षण का एक मिश्रण होता है।

इस प्रकार, कुतुब मीनार को ‘भूतहा’ कहने के पीछे विभिन्न कारण हैं, जो इसे दिल्ली की संस्कृति, इतिहास और कला का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं। यह एक रहस्यमय और आकर्षक नाम है जो लोगों की रुचि को बढ़ाता है और उन्हें इस ऐतिहासिक धरोहर की ओर आकर्षित करता है।
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