अपनी क्षमता एवं रुचि के अनुसार आप आगे बढ़ेंगे तो सफलता शीघ्र मिलती जाएगी। महापुरुषों ने कहा है कि अपने स्व की संतुष्टि के लिए एक संगीतकार संगीत की धुन तैयार करता है, एक कलाकार पेंटिंग करता है और कवि कविताएं लिखता है।
आशय यह है कि एक व्यक्ति के भीतर जिस प्रकार की क्षमता है, उसके अनुसार उसे प्रयास अवश्य करना चाहिए। जो है, उसे छोड़कर, जो नहीं है उस और भागना मानव स्वभाव है। फिर चाहे कोई चीज हो या रिश्ते। यूं आगे बढ़ना अच्छी बात है, पर कई बार सब मिल जाने के बावजूद वही कोना खाली रह जाता है, जो हमारा अपना होता है। हम विश्व से जुड़ते हैं, पर स्वयं से कट जाते हैं। प्रेक्षाध्यान में इसीलिए स्वयं से साक्षात्कार पर बल दिया गया है। यदि विश्व को बदलना चाहते हैं तो आरंभ घर से करें और परिवार को प्यार करें।
जरा सोचिए कि हम अपने जीवन में जितनी भी भूमिकाएं निभाते हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका -कौन-सी है और हम अपना जीवन कैसा बनाना चाहते हैं? क्या बच्चों को उनके भावी जीवन के लिए तैयार करना हमारा लक्ष्य है या फिर अपने समाज की सेवा करना ? दूसरों की उन्नति देखकर बुरा-सा मुंह बनाने वालों की कमी नहीं है। लगता है मानो हम मेहनत करके मिटे जा रहे हैं और दूसरे को सब बैठे बैठाए मिल रहा है।
अक्सर दूसरों की सफलता के पीछे हमें उनकी मेहनत भी तिकड़मबाजी ही नजर आती है। जो सफल लोगों से घृणा करते हैं, उनके साथ बस एक ही समस्या है। वे लोग उनकी प्रसिद्धि देखते हैं, पर उसके पीछे लगी मेहनत, संघर्ष और त्याग को नहीं देखते। कुछ लोग समाजसेवा से शुरुआत करते हैं तो कुछ ‘अपनी पसंद की चीजों से, लेकिन जब वे उस काम में उत्साह की हद तक लग जाते हैं तो वह उनके जीवन को सार्थकता प्रदान कर देता है। अगर किसी काम को करते हुए खुशी नहीं होती है तो उसे सार्थक बनाने का तरीका खोजें, जैसे उस क्षेत्र से जुड़ा नया कौशल सीखें। दूसरों की सहायता करें