इस साल अनंत चतुर्दशी 28 सितंबर, गुरुवार के दिन पड़ेगी. इस दिन भुजाओं पर पहने जाने वाले अनंत में 14 गांठें लगाई जाती हैं. पूजा के बाद ये अनंत घर के हर एक सदस्य की भुजाओं में बांधे जाते हैं.अनंत चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 27 सितंबर को रात में 10 बजकर 18 मिनट पर होगी और इसका समापन 28 सितंबर, गुरुवार को शाम 6 बजकर 49 मिनट पर होगा. लेकिन इस त्योहार को 28 सितंबर को ही मनाया जाएगा. पूजा का शुभ मुहूर्त गुरुवार को सुबह 6 बजकर 12 मिनट से शाम को 6 बजकर 49 मिनट तक है.

कैसे करें अनंत चतुर्दशी की पूजा
अनंत चतुर्दशी पर श्री हरि के अनंत रूप की पूजा दोपहर के समय की जाती है. लेकिन सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद पूजा वाली जगह पर कलश स्थापित करना चाहिए. कलश के ऊपर किसी बर्तन में कुश से बने अनंत रखें . अगर कुश का अनंत नहीं है तो भगवान श्री हरि की प्रतिमा भी रखी जा सकती है. इसके बाद एक पीले रंग के धागे में 14 गाठें लगाकर अनंत सूत्र बनाए और इसको विष्णु भगवान को अर्पण करें.धूप और दीप दिखा इनकी पूजा करें और अनंत सूत्र को पुरुषों की दायीं बाजू और महिलाओं की बायीं बाजू में बांधें.इसके बाद ब्राह्मणों को खाना खिलाना चाहिए.
अनंत का क्या है धार्मिक महत्व
अनंत चतुर्दशी के दिन पहने जाने वाले अनंत में 14 गांठें बाधने के पीछे का अपना अलग महत्व है. इसमें लगाई गई 14 गांठें हर डर से मुक्ति दिलाती है और रक्षा करती हैं. धार्मिक मान्यता के मुताबिक अनंत में 14 गांठें लगाने वाले व्यक्ति पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद बना रहता है. इन 14 गांठों का संबंध 14 लोकों से माना जाता है.यही वजह है कि इस दिन अनंत पहनाना बहुत गही शुभ माना जाता है.इस दिन व्रत रखने से श्रीहरि अनंत फल देते हैं और सभी मनोकामनाओं को पू्र्ण कर सुख-सौभाग्य और संतान सुख अपने भक्तों को देते हैं.
यह भी पढ़ें :- एक जाग्रत शिक्तिपीठ मां चामुंडा स्थान:बिहार

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, सुमंत नामक ब्राह्मण और महर्षि भृगु की पुत्री दीक्षा से एक कन्या की उत्पत्ति हुई. जिसका नाम सुशीला रखा गया. उस कन्या की माता दीक्षा का असमय देहावसान हो गया. तब ब्राह्मण सुमंत ने कर्कशा नामक एक लड़की से विवाह किया जबकि ब्राह्मण सुमंत की पुत्री सुशीला का विवाह कौण्डिन्य मुनि से हुआ. कहते हैं कि कर्कशा के क्रोध के चलते और उसके कृत्यों से सुशीला अत्यंत गरीब हो गई. एक बार सुशीला अपने पति के साथ जा रही थी उस दौरान उसने रास्ते में देखा कि एक नदी पर कुछ महिलायें व्रत कर रहीं हैं.
सुशीला के द्वारा पूंछने पर पता चला कि महिलाएं अनंत चतुर्दशी का व्रत और पूजन कर रही हैं. वे महिलाएं अनंत सूत्र की महिमा का गुणगान कर रही थी. महिलाओं द्वारा व्रत करने और अनंत सूत्र बांधने को देखकर सुशीला ने भी ऐसा ही किया. उसके बाद उन्हें अनंत सुख की प्राप्ति हुई. लेकिन कौण्डिन्य मुनि ने एक दिन गुस्से में आकर अनंत सूत्र तोड़ दिया. इसके बाद वे फिर से उन्हीं कष्टों से घिर गए. तब सुशीला ने क्षमा-प्रार्थना की. जिसके बाद अनंत देव (भगवान विष्णु) की उन पर फिर से कृपा हुई.
यह भी पढ़ें :- नरक निवारण चतुर्दशी 2023: इसलिए भगवान शिव को प्रिय है यह व्रत, भक्तों को मिलता है शिव कृपा का लाभ
उम्मीद है आपको आज की जानकारी अच्छी लगी होगी। ऐसी और जानकारी के लिए जुड़े रहिये हमारे साथ। नमस्कार.